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Minimal Poster: Seinfeld: The Outing
Made after Supreme Court of India thought of not messing with Article 377 and passing the buck to Parliament.
You may be as straight as straight can be and non-gay. Not that there’s anything wrong with that. You have your fundamental rights to do whatever you want to do in your privacy provided that you don’t hurt anybody or yourself. From where should I take out time to be even bothered to be annoyed at someone else’s lifestyle, apart from being jealous, is beyond me.

पास के क्रिकेट के मैदान में अब घास नहीं उगती,
हर कहीं पैर पड़ने की वजह से अब ज़मीन बंजर हो चली है |
खेल तो अब भी खेले जाते हैं, पास दूर से बहुत बच्चे रोज़ आते हैं,
दिन भर चिल्ल-पों मचता ही रहता है, मैदान यह सब चुपचाप सहता है |
बाउंड्री पर अब झाड़ भी सूख चूका है,
कोना कोना मटमैला रूख चूका है |
गेंद जब सरक कर कोने की दीवार पर आके टकराती है,
कराह उठता है वो मैदान जैसे कोई सुई चुभो दी हो |
नाराज़ तो होता है लेकिन बच्चो की ख़ुशी देख कर लौटा देता है गेंद,
उसे तो इंतज़ार रहता है कि अँधेरा हो और बच्चे घर लौट जाएँ |
शाम ढलते ही बाउंड्री के बाहर वाले पेड़ो पर पक्षी लौट आते हैं,
सुरीली से करतल ध्वनि उस मैदान को गाके सुनाते हैं |
उन्ही पेड़ों से रोड-लाइट की रौशनी जब छन के आती है मैदान पर,
कोई नहीं होता क्रिकेट खेलने वाला, असली तब आता है मज़ा उस मैदान को |
पक्षी भी सोचुके होते हैं तब तक, अलग सा सन्नाटा छा जाता है,
बाउंड्री की दीवारें तत्पर रहती है अँधेरे के लिए, मन ही मन मुस्कुराती हुई |
थोडा और अँधेरा ढलने पर, दीवारों पर फूल खिल उठते हैं,
थोड़े थोड़े अंतराल पर, जहां जहां रोशनी नहीं होती |
चहचहाते हैं फूल, अठखेलियाँ करते हैं,
मैदान खुश हो उठता है, पेड़ो से रौशनी और कम कर देता है |
जब तक फूल आपस में व्यस्त रहते हैं, निहारता रहता है सुनसान मैदान उन्हें,
दिन भर जो बंजर रहा, जैसे अँधेरा होते हैं वसंत ऋतू आ गई हो |
जो दिन भर हुल्लड़ बाजी और शोर शराबा होता रहा,
अँधेरे में वहीँ वायलिन और सैक्सोफोन बजने लगते हैं |
जब कोई गुज़रता है मैदान के बाहर से, कोशिश करता है मैदान के फूल disturb न हो,
गुजरने वाले को जिज्ञासा भी होती हो, तो होने दो, मैदान तो फूला नहीं समाता |
थोड़ा सा कभी बाहर वाला भी मुस्कुरा देता है फूलों को देख कर,
मैदान को आँख मार कर इशारा कर देता है, कि लगे रहो, अपने को क्या |
कुछ तुनकमिजाज़ियों को फूल पसंद नहीं, खांस कर वो जता देते हैं,
फूल भी समझ जाते हैं, कि अँधेरा काफी हो चला है |
उलझी हुई अपनी डालियों को सुलझा के बिछड़ जाते हैं,
मिलेंगे फिर यहीं, इसी वक़्त कह के एक बार फिर से बंजर कर जाते हैं मैदान |

Here are some pictures from Day 2 of Bangalore Literature Festival 2013. I was just happy to witness Gulzar Sahab speaking and attending my 2nd Literature Fest after attending Jaipur’s 2012 edition.

with Gulzar and Prasoon Joshi


William Dalrymple, Anjum Katyal and Nirmala Lakshman
Moderator: Vikram Sampath




Baradwaj Rangan, Sidharth Bhatia, M. K. Raghavendra and Nasreen Munni Kabir
Moderator: Sharmistha Gooptu


Life is a series of feelings like when you…