जेब छोटी थी, बटुआ बड़ा। बड़ा भाई रखता था तोह मेरी भी इच्छा होती थी। एक दिन मैं अपने दादा जी के पास गया। बोला कि मेरे बटुए मैं पैसे नहीं हैं, भाई के तोह पास बहुत सारे हैं। उन्होंने हंस के 10 का नोट दे दिया। मैंने वोह 10 का नोट, संभाल के पर्स की सबसे अन्दर वाली जेब में रख दिया।
वक़्त बीता, मैं कमाने लग गया । बटुआ अभी भी वही था।
आज सोचा कि नया बटुआ लूं। पुराने को यहीं कहीं किसी कोने में डालने ही वाला था की ध्यान आया कि उसके अन्दर एक 10 का नोट पड़ा हुआ है। आज दादाजी नहीं हैं। नोट को देखने की हिम्मत नहीं हुई और अब बटुआ पड़ा हुआ है अलमारी की अन्दर। सुरक्षित।
P.S.: Inspired by https://twitter.com/angrykopite/status/301390756751482881
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